45 thoughts on “Tum hoti toh kaisa hota (Original Poem) by Javed Akhtar at Kolkata Literary Meet 2016

  1. Dear Prasanna,
    Good Video !.
    First time i am listening original poem ' Tum Hoti To Kaisa hota'.

  2. इन झूठमूठ की, लकीरों पर,
    हम, झूठमूठ ही, लड़ते हैं .
    लेकिन, जो, खून बहता है, दोनों जानिब सरहद के, तुम मानों, या,
    ना मानो, वो, खून, सचमुच का होता है.
    लेकिन, जो, चीखे, उठती है. सरहद के, दोनों जानिब, वो चीखे, सचमुच की होती है.
    काश, वो खून और चीखे भी, झूठमूठ , की होती.
    काश, वो खून और चीखे भी.

  3. my eyes r filled with tears even at the age of just 23….i m scared wht wud happen when i ll listen these lines at the age of 55 or more…

  4. इस बार, ईद पर, गुल्लक को,
    पहले से, ज्यादा मोटी, करनी है.
    इस बार, गुल्लक को, खाना,
    बिन छुट्टी किये खिलाना है.
    नये कपड़े नये खिलोनो को, इस बार, 🏡 घर पे, बुलाना हैं.
    खूब करेंगे, खुल के मजे, इस बार, ईद की, छुट्टी पर,
    एक दोस्त है मेरा, बिन पापा का, उसके भी, कपड़े, सिलवाने हैं.
    इस बार, ईद पर, गुल्लक को,
    पहले से, ज्यादा मोटी करनी है..

  5. आओ, सूरज को, बना के लटटू , घर के, हर फर्श पे, नचाते हैं.
    वो चाँद, बड़ा घमंडी है, उसको भी,
    थौड़ा, दौड़ाते हैं.
    तारों को तोल के, तराज़ू मे, हर एक के माथे पे, लिखे वज़न उनका.
    और, हवा से, बातों बातों मे, पूछे,
    उससे , उसके घर का पता. .
    ये बादल, शौर मचाता हैं, उसको भी, थोड़ा, धमकाये,
    अब काम वाम तो, कुछ भी नही,
    चलो, नाकाम ही, हो जाए.

  6. मेरे, तकिये के, सिरहाने पर,
    एक बूढ़ी, बस्ती, बसती हैं.
    जहाँ रहती है, कुछ यादे,
    बिन बिस्तर के, बिन छप्पर के.

  7. हमने तुमने, जो लिखी थी,
    वो, कहानी और थी.
    आज जो, पढ़ने को बैठे,
    तो कहानी और हैं.

  8. ऐ दिल, तेरी मौजुदगी,
    बड़ी, खटटी मीठी, लगती है.
    तू , बोलता हैं, तो, धूप भी,
    ठंडी छाँव सी लगती है.
    ऐ दिल, तेरी मौजुदगी.

  9. इस चाँद के, ऊँचे टावर से,
    कोई भी, सिगनल आता नही .
    मैं, दिल के मोबाइल 📱 को लिये,
    हवाओ की, पूछ पकड़ता हूँ .

  10. क्यों मेरी कब्र पे भी,
    तुम, फूल चढ़ाते हो.
    ये दिल हैं दीवाने का,
    रिश्वत से ना बहलेगा.

  11. Sir mai youva gitkar aur kavi hu par mai kya karu unkavitao aur gito ko jiska mere pas yek bhi muly nahi,yese mai grib family se belomg karta hu sir jiske karn mera koi mere margdarsak nahi hai sir?plese reply

  12. प्रणाम 🙏🙏🙏🙏
    आप एक बहुत महान शायर है और बहुत पारदर्शिता है आपकी बातों में, मैं आपकी बातों को सुन सुन के, बड़ी भी आपके लेखों को पढ़कर आपकी कविताओं को सुनकर,
    तुम होती तो ऐसा होता,
    तुम होती तो वैसा होता…..
    दिल को छू लेते हैं लाइन आपकी 🙏🙏🙏🙏🙏💐💐💐💐💐💐👍👍👍👍

  13. بنجارہ

    جاوید اختر

    میں بنجارہ
    وقت کے کتنے شہروں سے گزرا ہوں
    لیکن
    وقت کے اس اک شہر سے جاتے جاتے مڑ کے دیکھ رہا ہوں
    سوچ رہا ہوں
    تم سے میرا یہ ناتا بھی ٹوٹ رہا ہے
    تم نے مجھ کو چھوڑا تھا جس شہر میں آ کر
    وقت کا اب وہ شہر بھی مجھ سے چھوٹ رہا ہے
    مجھ کو وداع کرنے آئے ہیں
    اس نگری کے سارے باسی
    وہ سارے دن
    جن کے کندھے پر سوتی ہے
    اب بھی تمہاری زلف کی خوشبو
    سارے لمحے
    جن کے ماتھے پر روشن
    اب بھی تمہارے لمس کا ٹیکا
    نم آنکھوں سے
    گم سم مجھ کو دیکھ رہے ہیں
    مجھ کو ان کے دکھ کا پتا ہے
    ان کو میرے غم کی خبر ہے
    لیکن مجھ کو حکم سفر ہے
    جانا ہوگا
    وقت کے اگلے شہر مجھے اب جانا ہوگا

    وقت کے اگلے شہر کے سارے باشندے
    سب دن سب راتیں
    جو تم سے ناواقف ہوں گے
    وہ کب میری بات سنیں گے
    مجھ سے کہیں گے
    جاؤ اپنی راہ لو راہی
    ہم کو کتنے کام پڑے ہیں
    جو بیتی سو بیت گئی
    اب وہ باتیں کیوں دہراتے ہو
    کندھے پر یہ جھولی رکھے
    کیوں پھرتے ہو کیا پاتے ہو
    میں بے چارہ
    اک بنجارہ
    آوارہ پھرتے پھرتے جب تھک جاؤں گا
    تنہائی کے ٹیلے پر جا کر بیٹھوں گا
    پھر جیسے پہچان کے مجھ کو
    اک بنجارہ جان کے مجھ کو
    وقت کے اگلے شہر کے سارے ننھے منے بھولے لمحے
    ننگے پاؤں
    دوڑے دوڑے بھاگے بھاگے آ جائیں گے
    مجھ کو گھیر کے بیٹھیں گے
    اور مجھ سے کہیں گے

    کیوں بنجارے

    تم تو وقت کے کتنے شہروں سے گزرے ہو
    ان شہروں کی کوئی کہانی ہمیں سناؤ

    ان سے کہوں گا

    ننھے لمحو!

    ایک تھی رانی
    سن کے کہانی
    سارے ننھے لمحے
    غمگیں ہو کر مجھ سے یہ پوچھیں گے
    تم کیوں ان کے شہر نہ آئیں
    لیکن ان کو بہلا لوں گا
    ان سے کہوں گا
    یہ مت پوچھو
    آنکھیں موندو
    اور یہ سوچو
    تم ہوتیں تو کیسا ہوتا
    تم یہ کہتیں
    تم وہ کہتیں
    تم اس بات پہ حیراں ہوتیں
    تم اس بات پہ کتنی ہنستیں
    تم ہوتیں تو ایسا ہوتا
    تم ہوتیں تو ویسا ہوتا

    دھیرے دھیرے
    میرے سارے ننھے لمحے
    سو جائیں گے
    اور میں
    پھر ہولے سے اٹھ کر
    اپنی یادوں کی جھولی کندھے پر رکھ کر
    پھر چل دوں گا
    وقت کے اگلے شہر کی جانب
    ننھے لمحوں کو سمجھانے
    بھولے لمحوں کو بہلانے
    یہی کہانی پھر دہرانے
    تم ہوتیں تو ایسا ہوتا
    تم ہوتیں تو ویسا ہوتا

  14. जब, सर को,पटकती हैं, बूंदे,
    हम, बारिश बारिश, कहते हैं.
    जब, सर को, पटकता हैं, पानी,
    हम, झरना झरना, कहते हैं.
    ये बात, समझ में, आती नही.
    हम, अपने मे ही, क्यों,जीते हैं.

  15. ये, चाँद 🌙, और सूरज 🌝की बाते, हमने, तुमने, बहुत कर ली, सनम,
    वो पास में, कुतिया बियायी हैं,
    चलो, दूध और बरेड, उसे,
    खिला आये .
    वो सड़क पार, एक, झोपडी़ मे,
    एक, बच्चा, दूध को, तरसता हैं.
    चलो, थोड़ा सा, दूध पिला के उसे, इबादत को, मुकम्मल कर आये .

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *